Sunday, 1 September 2013

आधुनिक हाईगा







           जब  भी कोई नया प्रयोग होता है , उसकीआलोचना  के रास्ते खुल जाते हैं .तब उसे सोने को खरा करने  की प्रक्रिया में शामिल कर लेती हूँ !
       और फिर जब स्वीकार की जड़ें गहरी  हों , तब अस्वीकार की बयार भी मन को गुदगुदाती है .
आख़िर  क्यूँ नही चढ़  पाया ' हाइकू'  जन -मानस  की 
जुबान  पर ? क्यूँ   हाइकू  दूसरे देश से आकर यहाँ अज़नबी  है ? ये  मेरे  मन में मुस्कुराते  जवाबों  के  सवाल हैं ! जो  आपके  सामने तनकर  खड़े  हैं !
            haiga  को  नए  कलेवर  में  लेकर ! thnx !
------------------------ डॉ . प्रतिभा  स्वाति