Tuesday, 10 July 2018

बेटी जब .....

 ठठा पड़ता  है भाई ....
भौजाई   मुंह  बनाती  है !
मुस्कुराते  हैं पिता भी ...
माँ  वारी   जाती  है  !

महकती  है  घर  में ...
बिटिया बनके  आती  है !
होती है अपनी मगर ...
पराई हो  जाती  है !

कभी  भेजती  है  राखी ...
कभी बुलाई  जाती  है !
दिल से दूर नही होती ...
न ही  भुलाई  जाती  है !

दहल  जाता  है दिल ...
ससुराल में सताई  जाती  है ?
उछलता  है मन बल्लियों.....
पलकों पे बिठाई  जाती है !

रोकर  दिल नहीं भरता ....
अतीत आगे  आता  है !
हर  बात  बचपन की ...
फिर  दोहराई जाती  है !

निकलते  हैं गठरी से ....
पुराने  वही  गुड्डे - गुड़िया !
किस्से जी उठते हैं फिर ....
लोरियाँ सुनाई जाती  हैं !

माँ  बनाती गोल मगर ...
तिरछी  उसे  भाती  है !
नाजुक  हाथ से अपने ...
बेटी  रोटी  बनाती  है !

कुछ  यादें कुछ ख़्वाब ...
 यूँ निकल  गई  सदियाँ  !
न  भूलती  है  बेटी और ...
न बेटी  भुलाई  जाती है !

बिदाई बस  रस्म समझिये ...
रस्म  तो  निभाई  जाती  है !
कलेजा  माँ  का छलनी ...
बेटी ना  भुलाई  जाती  है !
_____________________________ डॉ . प्रतिभा स्वाति





Saturday, 30 December 2017

रुको ,सदी के साल सत्रवें


 रुको  सदी  के  साल  सत्रवें ...
अरे ! अभी  तुम  जाओ  मत !
साथ  रहे  हम  बारह  मास ...
दामन्  यूँ  झटकाओ   मत !

बातें  कितनी  कहनी -सुननी ..
कितने काम अधूरे  हैं !
संकल्प  लिए  थे आने  पर ..
हुए  कहाँ वो  पूरे  हैं !

नया  साल  ही  चाहें  सब ...
साल  पुराना  मुझको  भाता !
इतने  दिन जो  साथ  रहा ...
कैसे  उससे  तोडूं   नाता ?

बातें  सुनकर  मुसकाते  हो ...
अरे  साल ! तुम क्यूँ  जाते  हो ?
कह दूँ सबको  बात  यही ?
गुपचुप मुझको  समझाते  हो :)

जाना -आना  महज  तमाशा..
बस ,कैलेंडर बदला  जाता  है !
तुम ही जाते -तुम  ही आते ..
नहीं  टूटता  नाता   है !

ज्यों  जाते  हैं सूर्य - चन्द्र ...
वही लौट फ़िर आते  हैं !
समय -चक्र  की  गणना  हेतु ..
"वर्ष "सहर्ष बदल जाते  हैं !

मिथ्या  जीवन का एक  सत्य है ..
जो जाता है वो आता  है !
काल सत्य  है यही शाश्वत ..
सतत आगे  बढ़ता  जाता  है !

सदियों  के  ये ठाठ - बाट  हैं :)
कहो ,समय  की बरसगाँठ है !
अहो ! समय की बरसगाँठ है !!
_________________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति

Saturday, 16 December 2017

भूलकर मत भूलना

 आज  फ़िर मुखर ....
मौन  के  संवाद  हैं !
हुए  विस्मृत  तुझे ...
मुझे सब  याद  हैं !

भाव  का  अभाव ...
ज़ख्म को  मरहम  नहीं !
शुष्क  है सम्वेदना ...
कामनाएँ  कम  नहीं !

शिकायतों  के सिलसिले ...
समाप्त हो  जाएँ समस्त !
कन्दराओं  से  निकल ....
हो नव -पथ  प्रशस्त !

रचें  नवीन  कुछ ...
भूल  जा  बातें  पुरानी !
रिक्त आकाश  है ...
आ  लिखें  कोई  कहानी !

भूलकर   मत  भूलना .....
शैशव की किलकारी - क्रंदन !
रिश्ते हैं  चंदन ...
कर  वन्दन या अभिनंदन !

हर  सदी  में क्यूँ .....
शिव  ही  पियें  गरल !
अर्जुन  ही के लिए ...
चक्रव्यूह  क्यूँ  हो सरल !

मां  नहीं  मिलाती .....
दूध में  पानी  कभी  !
शिशु जानता सच ....
संतति भूलती  सयानी सभी !
__________________________ डॉ. प्रतिभा  स्वाति



Thursday, 14 December 2017

पगली , तुम कब समझोगी ?!




 रे  पगली ....
 तुम  नहीं  समझोगी !
 कभी  भी ...
 सही  मायने  !

 समझकर  भी .....
 न  कह सकोगी !
 न सह  सकोगी !
 बहरे  समाज ने ..
 बना  दिया है ...
 तुम्हे  मूक ?

 जानती  हो , फ़िर  भी ?
हक़ीकत ,
हाथी के दांतों की ......
 "खाने  के और ...
दिखाने  के और "

पुरुष  का मुंह __ हुंह !!!
"मुंह में  राम...
बगल  में छूरी "
कहानी  है अधूरी !
आओ  मिलकर ..
अब  करें  पूरी !

बदल रहा है पुरुष  भी ...
आओ हम भी साथ  दें :)

कह  तो  रहा  है अब ...
कि  इसने  नहीं  कहा ..
जो अब तक 
हम  सबने  सहा ____

त्रिया  चरित्रम ..
पुरुषस्य   भाग्यम  ?
अरे  नहीं पगली !
पुरुषस्य  भाग्यम ...
तस्य  कर्म - फलम :)
________________________ डॉ . प्रतिभा स्वाति 

   


Sunday, 4 June 2017

मिस यू मां ....

 मुझे  मालूम  है ....... आज "मदर्स -डे "  नहीं है ............ पर क्या आपको मालूम है मेरी मां नही हैं ! मुझे  रोज़ याद आती हैं ! मैं ख़ुश  होकर कुछ  लिखती  हूँ और फिर रोती  हूँ .... छुपकर ......... जाने  कबसे ....  जाने  कब तक ....
------------------------ डॉ. प्रतिभा स्वाति






Saturday, 29 April 2017

अकेला कोई नहीं ......

:)

     देखा    जाए तो बस दो ही अहसास  हैं ,..... मुख्य ! ख़ुशी और गम ! बाकी तो सब सेकेंड्री  हैं :) निर्भर  हैं ... प्रतिक्रिया  हैं .... अस्थाई  हैं .... :)
आप सहमत न भी हों ....... तब भी बात के साथ आपकी असहमति होगी ..... कुल मिलाकर साथ बना रहेगा :)
                    "साथ " _______ ये साथ निहायत ज़ुरूरी  है ! अकेला कुछ नहीं  होता ! एक प्रतीति .... एक भ्रम .... एक भुलावा ... एक दम्भ .... एक  पीड़ा ... जो हमे उकसाती है ये कहने को की हम अकेले हैं ! हम अकेले हो ही  नही सकते ! इन्सान यदि  इन्सान के साथ न हो ... ना दिखे तो क्या अकेले  हो गए ?
                         हम अपनेआप में किसी भीड़ से कम नही :) ख़ाली  दीखते  हैं ...पर होते नही खाली ! अकेले दीखते हैं बस ....होते नहीं ! कोई  भाव ..... कोई संकल्प ....कोई  ख़्वाब .... कोई याद ....कोई गम .... कोई  ख़ुशी .... एक सैलाब .... एक  बवंडर ..... एक प्रवाह ..... निरंतर चलता है , हमारे   साथ .....  हमारें  भीतर .... हमारे आसपास ! सच मानें ..... आप अकेले नही  हैं ..... चाहकर भी अकेले  नहीं हो सकते !
                 जो अकेला दीखता है ..... वो शरीर है बंधू ! और शरीर  नश्वर है .... माटी  हैं :) दिल और दिमाग काबिज़  हैं ... इस माटी के खिलौने पर :)
                               हम तो परमात्मा का अंश हैं ! परमात्मा सागर है .... तब बूंद अकेली हो सकती है ? ईश्वर वो वृहद वृक्ष है ..... जहाँ हमारी औकात पात समान है ! हम कण मात्र हैं ! अणु ? नहीं .... परमाणु :) नहीं .... हम उस परमाणु के प्रोटान - न्यूट्रान - इलेक्ट्रान हैं :) हम अकेले नही हो सकते ! हमारी  सामर्थ्य  ही नहीं ! 
___________________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति