Thursday, 14 December 2017

पगली , तुम कब समझोगी ?!




 रे  पगली ....
 तुम  नहीं  समझोगी !
 कभी  भी ...
 सही  मायने  !

 समझकर  भी .....
 न  कह सकोगी !
 न सह  सकोगी !
 बहरे  समाज ने ..
 बना  दिया है ...
 तुम्हे  मूक ?

 जानती  हो , फ़िर  भी ?
हक़ीकत ,
हाथी के दांतों की ......
 "खाने  के और ...
दिखाने  के और "

पुरुष  का मुंह __ हुंह !!!
"मुंह में  राम...
बगल  में छूरी "
कहानी  है अधूरी !
आओ  मिलकर ..
अब  करें  पूरी !

बदल रहा है पुरुष  भी ...
आओ हम भी साथ  दें :)

कह  तो  रहा  है अब ...
कि  इसने  नहीं  कहा ..
जो अब तक 
हम  सबने  सहा ____

त्रिया  चरित्रम ..
पुरुषस्य   भाग्यम  ?
अरे  नहीं पगली !
पुरुषस्य  भाग्यम ...
तस्य  कर्म - फलम :)
________________________ डॉ . प्रतिभा स्वाति