Saturday, 23 April 2016

कहानी ...रोज़ नई चाहिए

 कोई भी प्रयोग ,पिछले प्रयोग से प्राप्त निष्कर्ष के बाद ही से उसे आधार बनाके शुरू किया जाता है .
मुझे कहानियां बहुत पसंद हैं , शुरू से . लेकिन जब भी कहानी सुनती उसकी शुरुआत- एक  था राजा ,एक थी परी , एक था खरगोश ,एक था ....... से होती थी . फ़िर उस कहानी में तमाम लोग आ जाते और कहानी के साथ मैं भी चलती फ़िर ...फ़िर कहानी ख़त्म हो जाती . मेरे घर में सबको कहानी आती थी नाना -नानी -मौसी -मामा सब माहिर थे कहानी सुनाने में . नहीं सुनानी आती थी तो सिर्फ़ मुझे . मैं सिर्फ़ कहानी सुनना जानती थी ...कहानी सुनना चाहती थी ....इसलिए कहानी सुनते -सुनते सोने के बजाए उठके बैठ जाती थी .कहानी खत्म होते ही पूछती थी --
फ़िर ? फ़िर क्या हुआ ?
फ़िर ? फ़िर कहानी खतम , चुक्कीपानी :)
नहीं मुझे बताओ , मैं ठुनकती
कल ,सुनाएँगे लक्खी बंजारे वाली , यदि अभी सो जाओगी तो , नहीं तो ....बाबा मुझे कल का लालच देके आज पीछा छुड़ा लेते :)
अगला दिन शुरू होते ही कहानी की ज़िद -
चलो अब सुनाओ !
अभी नहीं ,शाम को.
अभी क्यूँ नहीं ?
दिन में नहीं सुनाते हैं :)
क्यूँ ?
मामा रस्ता भूल जाता है !
_____________ ओह ! अब जब तक मामा घर लौटके नहीं आ जाते , मुझे रुकना ही होगा , मैं रूकती थी , रोज़ रूकती थी . वो रास्ता नहीं भूलते थे . लौट आते थे , देर से आते थे तो डांट खाते थे नाना की ! 
फ़िर धीरे -धीरे सब कम होता गया -ननिहाल जाना कम हो गया , वहां रहना कम हो गया , कहानियाँ भी कम हो गईं !
पर कुछ भी खत्म नहीं हुआ , मुझे रोज़ शाम वो सारी कहानियां एक -एक कर याद आती हैं . बाबा और मामा की याद आती है . मन ही मन फ़िर -फ़िर -फ़िर की रट लगाती हूँ '.फ़िर क्या फुर्रर्र ' मेरे मामा और मौसी इसी तरह मेरे मजे लेते थे . कहानी का लालच देके - चलो अब  पानी पिलाओ का काम कराते थे :) नहीं तो शाम को कहानी नहीं सुनाएँगे धमकी भी देते थे. मामा को कहानियाँ ज़रा कम आती थीं इसलिए झिकझिक ज़ियादा होती थी -
एक था बन्दर ..
नहीं ,बन्दर वाली नहीं 
क्यूँ ?
उस दिन सुनाई तो थी 
फ़िर कौनसी ? खरगोश वाली ?
हाँ खरगोश वाली :)
___________ये वही खरगोश वाली कहानी थी ,जो आप सबको पता है . थोड़े बड़े हुए ,तब वही खरगोश किताबों की कहानियों में भी मिला ....फ़िर एक दिन उछलकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ ... तुम लोग कब तक मुझे यूँ इस तरह अपनी कहानियों में दौड़ाओगे , मेरी उमर देखो , मैं थक गया हूँ ... मेरे नाती पोते भी बड़े हो गए हैं . उस शेर को मरे सौ साल हो गए .और तो और तमाम लोग पक चुके हैं तुम्हारी ये कहानी सुनके चलो कागज़ -पेन उठाओ ,मैं बताता हूँ आगे की कथा - तुम लिखो ....तुम लिखो ....और मैं कहानी लिखने लगी . और 20 बरस  की उम्र में  , ' नईदुनिया ' ने मेरी कहानी छाप दी और सिलसिला शुरू हो गया ' बच्चों की दुनिया' में प्रतिभा व्दिवेदी  छपने लगी . सखी -सहेलियों में धाक जम गई _________1984 में , मैं  कहनियाँ सुनने वाली नहीं लिखने वाली बन चुकी थी , मेरी माँ को मुझपर गर्व था .... की उनकी बेटी लिखती है , अख़बार में उसकी कहानी छपती है . उस कहानी का नई दुनिया मनीआर्डर भेजता था , उन रसीदों को मैंने बहुत समय तक सम्हाल के रखा अपने बच्चों को ये अख़बार और  रसीदें दिखाउंगी ________ ये प्रमाण बहुत जुरुरी हो गए हैं , अब ज़िन्दगी के लिए !
_______________ डॉ .प्रतिभा स्वाति