Saturday, 30 December 2017

रुको ,सदी के साल सत्रवें


 रुको  सदी  के  साल  सत्रवें ...
अरे ! अभी  तुम  जाओ  मत !
साथ  रहे  हम  बारह  मास ...
दामन्  यूँ  झटकाओ   मत !

बातें  कितनी  कहनी -सुननी ..
कितने काम अधूरे  हैं !
संकल्प  लिए  थे आने  पर ..
हुए  कहाँ वो  पूरे  हैं !

नया  साल  ही  चाहें  सब ...
साल  पुराना  मुझको  भाता !
इतने  दिन जो  साथ  रहा ...
कैसे  उससे  तोडूं   नाता ?

बातें  सुनकर  मुसकाते  हो ...
अरे  साल ! तुम क्यूँ  जाते  हो ?
कह दूँ सबको  बात  यही ?
गुपचुप मुझको  समझाते  हो :)

जाना -आना  महज  तमाशा..
बस ,कैलेंडर बदला  जाता  है !
तुम ही जाते -तुम  ही आते ..
नहीं  टूटता  नाता   है !

ज्यों  जाते  हैं सूर्य - चन्द्र ...
वही लौट फ़िर आते  हैं !
समय -चक्र  की  गणना  हेतु ..
"वर्ष "सहर्ष बदल जाते  हैं !

मिथ्या  जीवन का एक  सत्य है ..
जो जाता है वो आता  है !
काल सत्य  है यही शाश्वत ..
सतत आगे  बढ़ता  जाता  है !

सदियों  के  ये ठाठ - बाट  हैं :)
कहो ,समय  की बरसगाँठ है !
अहो ! समय की बरसगाँठ है !!
_________________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति