Sunday, 17 April 2016

मैं हूँ कहां ....कहाँ नहीं हूँ


 क्यूँ आज यूँ ही ,
मैं / इधर / आज ,
आ निकली हूँ ?
इस भीड़ में ,
जानते -बूझते ,
तन्हा ही भली हूँ !

अब नहीं करती ,
मैं जोश की बातें !
बदगुमानी में कभी ,
होश की बातें !

कत्ल की उस रात ,
पूनम थी या मावस ?
 गुजरते हैं आज तक 
मेरे दिन यूँ ही बस !

नहीं खोलती मगर,
कोई / कभी 
यादों का  झरोखा !
कुछ यकीं के किस्से,
 छलक ना पड़े कोई,
भूला हुआ धोका !

ठहरी हुई साँसे , 
उलझी  तो आख़िर ,
कहाँ आकर ?
 खत्म हैं मोहलतें ,
मौत हंसती है ,
ठठाकर !

आस अब भी है,
इक बची हुई !
ख़्वाब मैंने बुना था ,
थी मेरी रची हुई !

मेरी कब्र पे आकर ,
 फ़ातिहा पढ़ने वालो !
मैं वहाँ नहीं हूँ !
मैं रूह हूँ मेरी ही,
आज हुआ मालूम 
हूँ कहां ,कहां नहीं हूँ !
------------------------------- डॉ. प्रतिभा स्वाति