Saturday, 14 May 2016

ऐब ....तुझमें नज़र आते हैं

          गलती ,भूल , गुनाह ,पाप, अपराध,ऐब ,नकार , बुराई, कमी या खामी _______ ! कुल मिलाकर कितने भी पर्याय ले  आऊँ , प्रत्यक्ष  या परोक्ष इशारा ' दुर्गुण ' की तरफ़ ही है ! ये  कहाँ से आते हैं ? कितनी प्रकार के होते हैं ? इन्हें कैसे दूर किया जा सकता  है ? यदि इन्हें दूर ना किया जाए तो क्या दुष्परिणाम  होंगे ?
___________________ इसी खयाल से fb पर ये दो लाइन डाल दीं , देखिये कितनी छिछालेदर होगी ! जितने मुंह उतनी बातें !  मामला उलझ सकता है ! हल - समाधान - निराकरण की उम्मीद जरा कम ही है !


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" ऐब "............ जो मुझमें हैं !

ज़ाहिर करूँ ...........किसपर ?


___________________ डॉ . प्रतिभा स्वाति

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 ____________ मानव  गलतियों  का पुतला है " इस" सन्दर्भ में इस बात को शामिल कर सकते  हैं पर पूर्ण सहमति देना  मानवता  नहीं होगी !

______________ गलती हर इनसान से होती है जाने या अनजाने में .अनजाने में हुई गलती का कारण  कोई भी  हो ,वो  क्षम्य  हो सकती है . उसे सुधारा  जा सकता है . लेकिन जो जानबूझकर  की जाती है  उसके कारण तमाम  हो सकते हैं और परिणाम  घातक हो सकते हैं !वो अपराध  की श्रेणी में आ सकते  हैं जहाँ  सज़ा का  प्रावधान है .
________इसीलिए  माँ को पहला गुरु कहा गया है .वह देती  है संस्कार . जो  अच्छे चरित्र के लिए अनिवार्य होते हैं . खराब से खराब माँ भी अपने बच्चों की ख़ुशहाली के लिए उन्हें अच्छी  बातें सिखाती  है . बुरे  काम से रोकती  है .तब जाकर  समाज को एक अच्छे  नागरिक को पाने  की उम्मीद  बंधती है !
___________ फ़िर कहाँ  बनते हैं ज़ुर्म और कहाँ से आते हैं गुनहगार ? यदि गुनहगार  कोई है ही तब उसे ज़ुर्म का अवसर क्यूँ दिया जाए ? ज़ुर्म होने पर असर औरों पर  भी  होगा ! लेकिन ज़ुर्म करने पर जहाँ साबित करने  का प्रावधान  है वहां ज़ुर्म  किये बिना अपराधी सोच और चरित्र की  धरपकड़  हास्यास्पद और हवाई लगती है ! उसे  न्यायोचित  क़रार  नहीं दिया  जा  सकता ! लेकिन  समस्या  की तह  तक  जाने के लिए उसकी  जड़ को  मिटाने  के लिए ये  कदम ज़ुरूरी  है !
____________ यदि कुछ  विशेष की प्राप्ति  की अभिलाशा  हो तब रिस्क  तो  लेना पड़ेगा , कोशिश  तो  करनी  पड़ेगी .लेकिन  यदि  प्रयत्न 100 %  ईमानदारी  से  हो  तब भले अर्जुन  को पूरी  चिड़िया  दिखे ,निशाना  आँख  पर  ही  लगेगा . अब  न इतनी  ईमानदार  कोशिश  होगी ना  लक्ष्य  की प्राप्ति ! तब सब  यूँ  ही चलेगा , चलता रहेगा . फ़िर  क्यूँ  नहीं  इस विषय  ही  को दरकिनार  कर  हम ख़ुशी  के  रास्ते  ख़ोज  लें ! खुशबू  के  सवेरे  को  दोपहर तक रोकने  का  यत्न  करें ! तब  शायद अप्राप्य  की  जलन पर   कोई  शीतल  अहसास राहत दे . ये   हो सकता  है . यहाँ  ईमानदारी 100  प्रतिशत  ना भी  रही  तो  चलेगा बस  सोच सकारात्मक  हो . इसमें  कोई दिक्कत  नहीं . इसका  रोपण  बचपन  ही में होता  है ! माँ  का   दायित्व  बढ़ा  रहे  हैं  हम  इसी  बहाने  से , इसी  गरज़  से ! पर ...
__________________ क्या  हमें हक़ है ,माँ  के निर्बल  कांधों  पर और बोझ  डालने  का ? हम  जो  फर्ज़  से  नज़रें  चुराते  हैं . किस  मुंह  से गिले शिकवे और हक़ की बात करते  हैं ? हमें आदत  हो  गई है अपेक्षा  का  कटोरा  लेकर  भीख  मांगने  की ! दूसरों  में कमी देखने  की ! हमें  ख़ुद  को  सुधारने  की ज़ुरूरत  है ,अनिवार्यता  है ! इस शुरुआत  का  कोई  महूरत  नहीं , आज  से .....अभी से ...
___________________________ डॉ . प्रतिभा स्वाति