Tuesday, 5 January 2016

वही याद आते हैं

बहा काजल, 
कुछ यादें हैं तेरी,
रातें अँधेरी!

उजाले भुलाते हैं ?
नहीं आते हैं !

दिन में स्वप्न कोई !

मनभावन !

कुछ रिश्ते सुहाने ,
मुझे बुलाने,
चले रोज़ आते हैं !

पर प्रीत के दीप,
नैन या सीप !
क्यूँ मोती बहाते हैं
वोही याद आते हैं !

------------------------------- इतनी रात को , इतने दिन बाद ,मन मचल रहा था लिखने के लिए या धिक्कार रहा था, न लिखने के लिए ! सोचा हाइकू लिखकर ख़ुद को फ़ुसला दूँ , फ़िर चोका लिखने का मन हुआ , पर अब मैं तैयार नहीं अक्षर और लाइंस गिनने के लिए :) मैं आई थी ईट जमाने , फ़िर दीवार चुनने बैठ गई , अब ये ख्वाहिश तो बेमानी होगी की मै मीनार बनाकर ही जाऊं :)