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Tuesday, 5 January 2016

वही याद आते हैं

बहा काजल, 
कुछ यादें हैं तेरी,
रातें अँधेरी!

उजाले भुलाते हैं ?
नहीं आते हैं !

दिन में स्वप्न कोई !

मनभावन !

कुछ रिश्ते सुहाने ,
मुझे बुलाने,
चले रोज़ आते हैं !

पर प्रीत के दीप,
नैन या सीप !
क्यूँ मोती बहाते हैं
वोही याद आते हैं !

------------------------------- इतनी रात को , इतने दिन बाद ,मन मचल रहा था लिखने के लिए या धिक्कार रहा था, न लिखने के लिए ! सोचा हाइकू लिखकर ख़ुद को फ़ुसला दूँ , फ़िर चोका लिखने का मन हुआ , पर अब मैं तैयार नहीं अक्षर और लाइंस गिनने के लिए :) मैं आई थी ईट जमाने , फ़िर दीवार चुनने बैठ गई , अब ये ख्वाहिश तो बेमानी होगी की मै मीनार बनाकर ही जाऊं :)   





Sunday, 18 May 2014

शीशमहल

  


शीशमहल !
कैद राजकुमारी !
विपदा भारी !

क्या है ? शीशे  के पार !
बड़ी लाचार !

देखे तो है / सबको !
क्यूँ / दिखे न / किसीको !

ये मायाजाल !
किसे कहे निकाल ?

कैसा  समय-चक्र  ?
है शनि -वक्र !

दिन -बहुरे !
फिर खिला आकाश !
लो टूटा  नागपाश !
--------------------------- चोका : डॉ . प्रतिभा स्वाति

Saturday, 16 November 2013

6 चोका रचनाएँ

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            सबसे  पहले  मै  अपने  ' हाइकू ' लेकर fb पर 
ही गई / आम इंसान के बीच ! मै हिंदी को हिंदी ही में 
लिखना  चाहती थी ! आम इंसान नाराज़ हो गया जब 
mob . पर  हिंदी font नही दिखे ! और मै ख़ुदको राजी 
नहीं कर पा रही थी eng . font में हाइकू लिखने  के लिए ! तब एक page  बनाया ! पोस्ट पेंट करके दी ,तब सभीको  ' हाइकू ' हिंदी में लिखे होने पर भी दिखने लगे !
' अभी मैने ये नही कहा की समझ में आने लगे !'
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             हर 4 पोस्ट  के  बाद बड़े  धैर्य से मै बताती  रही कि' हाइकू  क्या है ?' और  ' haiga ' देने लगी , उन्हें  बिना बताए ही !' वे' पसंद  करने  लगे ! खुबसूरत  चित्र ' उन्हें'  ' लुभाने  लगे !
              और मै उसी page पर bina उन्हें  बताए सेदोका / टंका / और चोका रचनाएँ  देने लगी :)

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चोका : हरसिंगार 
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चोका : पर्दे  के पीछे 

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देख  रहे  हैं न आप ----' चोका ' रचना  की शुरुआत हाइकू  ही से हो रही है ! और समापन में अंतिम 5 लाइंस 'टंका ' की है !

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          किसी  भी  lain को  देखिये उसमे 5 वर्ण  हैं / या फिर 7 . इनका  एक निश्चित  क्रम भी है ! निश्चित संख्या भी , जो तय  करती है की रचना हाइकू है / टंका है / सेदोका  है या चोका ! आपको बतादू  2 हाइकू कभी 
नही मिलते , अकेले 1 व्यक्ति  के ! वैसे  अभ्यास या सीखने  की प्रक्रिया में यह  जायज़ है ! किन्तु  आदर्श या अनुकरणीय नही !

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           कई बार मात्र 5-7 अक्षर का चयन जो की हर रचना का अनिवार्य  अनुशासन है , उसके रस में वो प्रवाह नही पाता , वो लय नही आ पाती , गीतात्मकता नही आ पाती. लेकिन  करत -2 अभ्यास  ते .......

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             मैं  भी अभ्यास  ही के दौर से गुज़र रही हूँ, रचना में कमी, उसके रस में आ सकती है . पर उसके 
व्याकरण और मनोविज्ञान को मैंने अपने शोध के दौरां भली प्रकार समझने की कोशिश की है !

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                                    thnx 
_______________                                              डॉ . प्रतिभा स्वाति 
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Wednesday, 7 August 2013

सुनो कबीर .... (1)

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सुनो  कबीर !
रे  सुन भई  साधो !
कलयुग  है !
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मात -पिता  को ,
अब मान नहीं है !
सब  ही अंधे ,
कोई ज्ञान  नही है !
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स्वार्थ  की पूजा !
हर  घर  में  होती !
देहरी  तक  आके ,
खुशियाँ  रोतीं !
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मन  में अनबन !
झूठे  बंधन !
दादा -दादी - दोहती !
नाती क्या पोती ?
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कोई रिश्ता  ना दूजा !
पैसे  की  पूजा !
सीधी हैं  खासी ,
सब उलटबासी !
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सुन  रे साधो !
राम -रहीम में धोखा !

सब कहते ,
भैय्या !पैसा  ही चोखा !
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सुनो  कबीर !
अब  तोता औ मैना ,
जीवनभर ,
लड़ते औ मरते !
सच  में भैय्या ,
प्यार नही  करते !
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---------------------------jari -----hsesh bha  2.

Tuesday, 18 June 2013

माँ


आँखें




  चाँद






चोका / माँ



तांका / कृष्ण