Thursday, 21 January 2016

मुझको याद नहीं...

 जीवन के इस ,
बीहड़ में !
मौन- मौन का ,
पहरा है !
आशाओं के,
मद्धिम दीपक !
अँधियारा बेहद,
गहरा है !

कितनी ही मैं ,
कोशिश कर लूँ,
अब होता कोई,
संवाद नहीं !
ओह ! मुझको जैसे,
कुछ भी याद नहीं .

शायद , वो सारे ,
ख़्वाब सुनहरे ,
मेरे थे !
शायद ,महक भरे,
रैन- सबेरे,
 मेरे थे  !

पर तम के ,
इस घेरे में!
उहापोह के,
फेरे में !
सोच यही ,
बस रहती है -
जीवन के इन,
जंजालों से ,
कोई भी ,
आजाद नहीं !

हाय , मुझको अब
रहता कुछ भी याद नहीं !

घनघोर , निराशा के
काले पल हैं ?
छूटे ,जीवन के 
सम्बल हैं ?

जीवन की बस्ती ,
उजड़ गई ?
कुछ भी क्या,
आबाद नहीं ?

सच, कहती हूं,
मुझको ,कुछ भी याद नहीं !
कुछ भी.............याद नहीं !
______________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति