Sunday, 17 January 2016

खालीपन ,अम्बर -सा है


तेरे - मेरे- इसके -उसके,
जाने कितने किस्से हैं !
सब रहते दिल में मेरे,
सबके अपने हिस्से हैं !

पर अब भी मेरे दिल का ,
इक कोना कैसे ख़ाली है ?
आज मिली फुर्सत मुझको,
नज़र उसीपर डाली है !

 भटक रहे हैं जाने कितने,
सपने आकुल बसने को !
और ख्वाहिशों की डोरी,
व्याकुल कोना कसने को !

मुझे लगा ये खालीपन ,
कुछ-कुछ अम्बर जैसा है!
टाकुंगी मैं चाँद यहाँ पर,
' जो'भाता मुझे हमेशा है !

------------------------------- डॉ. प्रतिभा स्वाति