Sunday, 23 April 2017

आईना ....

  आख़िर  ऐसी  भी क्या  बात  है आईने  में , कि   गौरैया  तक ..... वाह बात कैसे  नहीं ,यही  वो  चीज़  है जो जाने क्या -क्या गुमाँ  पैदा  करती है :) और  मुहावरों  के लच्छे  भी ख़ूब  चले इसे  लेकर ........ जब  नहीं था तब ? पानी में प्रतिबिम्ब  या फिर प्रियतमा  की आँखों में  देखे  जाने  का  चलन  था .... ऐसा  पढ़ा -सुना  है ! लेकिन  उससे  भी  पहले ....बहुत  पहले ... आदि मानव ,इस  झमेले  से  परे था ! ख़ुश  था ! सेहतमंद और बेफ़िक्र  भी ! उसके  पास  अपनी  भाषा थी .... इशारे  थे ! शिक्षा  नही थी ...न तकनीक  थी .... ये  सब धीरे - धीरे विकसित  हुआ ...... हम अब भी  विकासशील  ही  हैं .... तरक्की  हमें  कौनसा  दिन  दिखाकर  ,कहाँ  पहुचाएगी .ये  भी  नही  मालूम ! एक  जादुई  आईने  का  ज़िक्र  कथाओ  में  बड़ा सुना  .... यदि  उसकी इजाद  हो  जाए तो ..... आसानी  होगी ? ना जी हम  अब उस मुहाने पर हैं जहाँ ........... आसानी के आसार दूर तक नहीं :)