Wednesday, 25 December 2013

अर्थों के फल

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ये / जंज़ीरें !
मुझे  ही  कब दिखी  हैं ?
हे / ईश्वर !
जो तुमने / मेरे ,
भाग्य  में  लिखी  हैं  !
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उन  फूलों  को देखती  हूँ !
उन काँटों  को  देखती  हूँ !
फिर / मुझको  क्यूँ गिला ?
की/ क्या - क्या नहीं मिला !
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फूल -सा मन / दिया !
खुशबू से महकते खयाल !
दिये बीज / शब्दों के !
उगाती  हूँ / रोज़ फ़सल !
पर / क्यूँ नही पकते ?
आजकल / अर्थों के फल ?
----------------------------------- डॉ . प्रतिभा स्वाति