Monday, 2 February 2015

तुम आसमां...मैं ज़मीं हूँ शायद !





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ये बात और है......... कि  वो दोनों ,
क्षितिज़ पर..... ज़रा देर को ठहरे !
नहीँ दोनों में, कोई  गिला-शिकवा,
दिखें इन्द्रधनुष औ ख़्वाब सुनहरे !
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ज़मी को है.........गिला ख़ुद से !
आसमां को .. कुछ दे नहीं पाती !
हर मौसम से की हैं..... मनुहारें ,
कोई तो पहुंचाए ,प्रेम की पाती !
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पर आसमां ...सब समझता है !
है दोनों ही की ..........मज़बूरी !
रिश्ता जब, दिल में  पनपता है ,
मायने  नहीं रखती  कोई  दूरी .
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संदेसे ......रुसवाइयों के डर से !
ले  जाती है .....किरण छुपकर !
ज़मीं को नाज़  है........... बेहद ,
अपने........... नीले आसमां पर .
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कभी .............चांदनी उढ़ाता है !
कभी .................धूप की चूनर !
देती  दिल  से  दुआएं   फ़िर ,
आसमां को ,ज़मी ख़ुश होकर !
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कह दो ............ज़माने  की ,
उट्ठी हुई .......अँगुलियों  से !
दोनों के ....दरमियाँ रिश्ता,
सचमुच ,निहायत पावन है .

सुबूत ........ये मौसम है !
और ये .........नज़ारे  हैं !
रिमझिम .......बरसकर !
गवाही देता ......सावन है !
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ये रिश्ता , बेहद पावन है !
ये रिश्ता, बेहद पावन है !
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___________ डॉ. प्रतिभा स्वाति

23 comments:

  1. खूब लिखा है आपने ।मन प्रस्सन हो गया पढ़ कर ।साधुवाद।

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  2. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण...

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  3. Mun mohak taal me bhaavo ki rachna, Zamin apne priyatum asman ko poori samarpit . Dono ki parsannta hi prakrti ke rath ko kheenchti hai. Sowaty ji ati sunder kavye , aur chit mohuk animated MUN ki chhavi---phoolo ki pari Dr. Pratibha Sowaty .

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  4. सार्थक प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (04-02-2015) को रहे विपक्षी खीज, रात दिन बढ़ता चंदा ; चर्चा मंच 1879 पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. वाह बेहतरीन रचना प्रतिभा जी

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  6. बहुत ही सुदर शब्दों से गूंथा है प्रेम के माहोल को ...

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  7. वाह जी वाह क्या सुंदर रचना लिखी है आपको धन्यवाद..
    मेर ब्लॉग पर आप सभी लोगो का हार्दिक स्वागत है

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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